ham khud ko samajh rahe hain. shayad isme samay jyada lagaga. ho sakta hai ki samajh na bhi paoon. fir bhi koshish karta rahoonga. karibion ka sath bhi leta rahoonga.
Wednesday, December 30, 2009
Tuesday, December 29, 2009
६० साल के जवान
वाह रे नारायण दत्त तिवारी जी। यदि चैनल की बात सही है तो आपने कमाल कर दिया। बुढ़ापे में भी धमाल कर दिया। जवानी में भी इतना जोश कम ही लोगों को होता है। आपने तो साबित किया है की ६० साल के बाद भी जवानी आती है। आप भी जवान हो गए हैं। देश की राजनीती को आपने क्या दिया ये तो जनता जाने। लेकिन समाज को आपने दिखाया की पत्नी की असमय मौत ने आपको कितना रसिया बना दिया। आपका रसीला रूप समाज के घातक तो नहीं ही होगा। क्योंकि देश दिशा बहुत जल्द बदल जाती है।
Tuesday, November 3, 2009
करीना का प्यार
करीना कपूर ने शाहिद कपूर को क्यों छोड़ा। सैफ अली खान से गलबहियां किए क्यों घूम रही हैं। क्या शाहिद ने अभी तक किसी से प्यार किया। क्या करीना सच में सैफ से प्यार करती हैं। क्या सैफ सही मायने में करीना को दिल दे बैठे हैं। इन सवालों के जवाब तब तक पूछे जाते रहेंगे, जब तक करीना और सैफ की शादी नहीं हो जाती। करीना शाहिद के साथ रात-रात भर अकेली घूम चुकी हैं। सैफ तो अमृता के साथ शादी करके बच्चे पैदा कर चुके हैं। करीना ने शाहिद को छोड़ दिया।सैफ ने अमृता से नाता तोड़ लिया। यह सबको पता है कि सैफ ने अमृता से प्रेम विवाह किया था। उसी तरह करीना और शाहिद आपस में प्यार ही करते थे। करीना कपूर खानदान की चिराग हैं। सैफ पटौदी घराने के वारिस हैं। लेकिन, प्यार के मामले में दोनों ने धोखा दिया। क्योंकि, करीना से शाहिद अब भी प्यार करने की बात करते हैं। अमृता भी सैफ को छोड़ने के बाद किसी के साथ घूमना पसंद नहीं किया। असल मे सैफ को लग रहा है कि उनके हाथ खूबसूरती का खजाना लगा है। जबकि, करीना को लगता है कि सैफ बांके करारे जवान और अनुभवी मर्द हैं। करीना को यह पता है कि सैफ के पास पैसा भी खूब है।
जबकि, शाहिद कपूर को कम से कम बच्चे पैदा करने का अनुभव तो नहीं है। वे जवां मर्द की दिखते भी नहीं है। उनके चेहरे से मर्दानगी की जगह मासूमियत टपकटती है। वे छैल छबीले बन भी नहीं सकते। उनके पास पैसा भी सैफ की तुलना में कम है। असल में शाहिद इमोशनल हैं। उन्होंने करीना को सच्चे दिल से प्यार किया। ऎसा उनके हाव भाव देखने से अंदाजा लगाया जा सकता है। वे करीना की आंखों में खोना चाहते थे। वे करीना की सेक्स अपील से मतलब नहीं रखते थे। शायद यहीं पर वे गच्चा खा गए। करीना बिंदास हैं। वे प्रोफेशनल हैं।
उनको पता है कि शादी के बाद बॉलीवुड में कोई पूछने वाला नहीं है। यही करिश्मा और अभिषेक के साथ हुआ था। हालांकि, करिश्मा भी अभिषेक से शादी करना चाहती थीं। लेकिन, उनकी मां बबिता कपूर ने ऎहसास कराया कि जितना पैसा संजय के पास है, उतनी हैसियत अभिषेक की नहीं है। इसी के चलते करिश्मा ने अभिषेक को छोड़ दिया। बबिता ने बॉलीवुड में बहुत कुछ हासिल करने का सपना देखा था। वे पैसा भी खूब कमाना चाहती थीं। लेकिन, कपूर खानदान की मर्यादाओं में उनकी चल नहीं पाई। जब बेटियां जवान हुई तो उन्हें खुली छूट दे दी। पिता रणधीर कपूर सीधे हैं। सिर्फ वेट एंड वॉच पर हैं।
Sunday, November 1, 2009
दुष्यंत की याद में
संचार मंत्रालय ने गीतकार दुष्यंत कुमार पर डाक टिकट जारी किया है। यह सुनना मीठा लग सकता है। लेकिन, कड़वी बात यह रही कि मंत्रालय ने इसे बेहद गोपनीय रखा। फिर भी सुखदायक है कि दुष्यंत जैसे लोग भी सरकारी महकमे को याद आ जाते हैं। नहीं तो किसी को फुरसत कहां है। भ्रष्टाचार के ज्वालामुखी पर खड़ा देश कहां जाएगा, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है। लेकिन, यह तय है कि दुष्यंत जैसों की यादें रोमांचित करती रहेंगी। कुछ करने का जज्बा देती रहेंगी। शायद अच्छा बनने की राह भी दिखाती रहेंगी। संभव है सरकारी महकमा भी कुछ सुधर जाए। नहीं भी सुधरेगा तो क्या हुआ। देश तो चलता रहा है। आगे भी चलता रहेगा।दुष्यंत की पंक्तियां जवानी में ज्यादा अच्छी लगती हैं। जवानी सपनों की दुनिया में रहती है। इसीलिए सबकुछ रूमानी लगता है। दुष्यंत कुमार स्कूल या साहित्यिक मत के हिमायती नहीं थे। वे एक ऎसी कविता शैली की तलाश कर रहे थे जो स्वाभाविक हो। काव्य के प्रति उनके इसी दृष्टिकोण ने उनमें सामान्य जीवन के यथार्थ के प्रति विश्वास पैदा किया। 70 के दशक के में दुष्यंत ने गजल को नई जिंदगी दी। दिल को छूने वाली सामाजिक सच्चाइयों को सामने रखा। उनकी शैली ने लोगों पर जादू किया। वे खूब पढ़े गए। पढ़े जा रहे हैं। आगे भी उनके दीवाने कम नहीं होंगे। उनका संग्रह साये में धूप ने तो धमाल ही कर दिया। उनका दर्द हर शब्दों में बयां होता था।॥यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहां से चलें और उम्रभर के लिए। वे क्रांतिकारी भी थे। संवेदनशील भी। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।
उनकी ये पंक्तियां भी रोमांचित जरूर करती हैं
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।दोस्तों, अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नैपथ्य में संभावना है। यह पहाड़ी पांव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है, कल दरीचे ही बनेंगे द्वार, अब तो पथ यही है।एक चिनगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों, इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कंमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा, मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं, कोई हंगामा करो ऎसे गुजर होगी नहीं। यह लड़ाई, जो कि अपने आपसे मैंने लड़ी है, यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है।कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए, कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नहीं, पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बद्दुआ।
Tuesday, August 11, 2009
राखी की खूबसूरती
राखी सावंत जवान हैं। खूबसूरत शायद नहीं हैं। वे खुद भी कहती हैं कि मैं तो सेक्सी हूं। सेक्सी होने और खूबसूरत होने का अंतर शायद जवानी में ही पता चलता है। लेकिन, खूबसूरती की परिभाषा राखी शायद समझ भी नहीं सकती। उन्हें समझाया भी नहीं जा सकता। जो खूबसूरत होते हैं। उन्हें बताने की जरूरत नहीं होती। वे भीड़ में अलग ही दिखते हैं। राखी का चेहरा ऎसा है कि न तो वे लड़की लगती हैं। न ही वे महिलाओं जैसी नजर आती हैं। अच्छी प्रेमिका के गुण तो उनमें झलकते नहीं। अच्छी बीवी बनना वे कब सीखेंगी, पता नहीं।हम उनकी बुराई नहीं कर रहे। हम तो दिल की कह रहे हैं। राखी यदि खूबसूरत हैं तो गायत्री देवी कैसी थीं। राखी यदि सेक्सी हैं तो नरगिस कैसी थीं।लेकिन, राखी को कहना पड़ता है कि वे सेक्सी हैं। सेक्सी अपील उनके किस अंग में हैं। इसके लिए भी उन्हें अंग प्रदर्शन करना पड़ता है। बोलती तो राखी बिंदास ही है। इसी लिए वे अपने को बिंदास बाला भी कहलवाना पसंद करती हैं। अभिषेक अवस्थी से प्यार करती थीं। उनके साथ रहती भी थीं।
अब एनआरआई इलेस के साथ शादी की चर्च चल रही है। बिन ब्याही मां बनने की भी बात हो रही है। लेकिन, उनकी खूबसूरती और सेक्स अपील अभी न जाने कितने को दीवाना बनाएगी। कहने का मतलब यह है कि राखी सेक्स अपील और खूबसूरती को सरे बाजार बेचना जानती हैं। खरीदने वाले इतने ज्यादा हैं कि मोल तो लग ही जाता है। मोल लगाने वाले भी निराश नहीं होते। राखी बाजार को जानती हैं। बाजार राखी को जानता है। दोनों एक दूसरे को बेवकूफ समझ रहे हैं। बेवकूफ बना भी रहे हैं।
Thursday, August 6, 2009
इंडिया में प्लेब्वॉय
वयस्कों की मशहूर पत्रिका प्लेब्वॉय के चहेते खुश हो सकते हैं। इसको बेचने वाले अब भारत में अपना बड़ा बाजार बनाना चाहते हैं। पत्रिका समूह इस ब्रांड के जूते चप्पल और अन्य सामान भी बेचेंगे। उम्मीद की जा सकती है कि प्लेब्वॉय ब्रांड भारत में खूब हिट होगा। जवानी दीवानी की कहावत कहीं और सही हो या न हो, भारत में तो खरी उतरती है।यहां छुप—छुप कर जवानी की बारात जैसी फिल्में खूब देखी जाती हैं। ऎसे में नंग धडंग तस्वीरें छाप कर प्लेब्वॉय वाले यहां खूब नाम कमा सकते हैं।यह जरूर है कि प्लेब्वॉय से भी ज्यादा बोल्ड तस्वीरें भारत के पत्र पत्रिकाओं में छपती रही हैं। लेकिन, प्लब्वॉय का आकर्षण यहां के लोगों को ज्यादा खींचेगा। इसका मुख्यालय शिकागो में है। भारत में पुरूषों के लिए इत्र बेचने की शुरूआत तो इसने कर दी है। महिलाओं से जुड़े उत्पाद भी आने में देर नहीं लगने वाली। सवाल यह है कि भारत में इस तरह के ब्रांड को हिट कराने के लिए किसका सहारा लिया जाएगा।
पामेला एंडरसन जैसी सेक्स अपील किसमें खोजेंगे।अब भारतीय समाज में सीता, पार्वती की तस्वीरें कमरों में सजारे का जमाना रहा नहीं। या तो सचिन दिखेंगे या फिर मैडोना। सानिया मिर्जा दिखेगी या फिर एंजेलिना जोली। किसी भी देश का समाज तेजी से भागता है तो वह दूसरे देश की नकल करता है। इस चक्कर में उसे अपने में कमी दिखती है। सामने वाले में सबकुछ अच्छा ही झलकता है। कहने का मतलब यह नहीं है कि बदलाव गलत है। असल मुद्दा यह है कि अंधी दौड़ का बदलाव पीछे ही धकेलता है।
Sunday, August 2, 2009
राणा चंद्र सिंह
पाकिस्तान में शाही शानो-शौकत के प्रतीक अमरकोट राजवंश के राजा राणा चंद्र सिंह सोढ़ा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। 79 साल तक शाही जिंदगी जी। पाकिस्तान में हिंदुओं का परचम बुलंद करने की कोशिश करते रहे। लेकिन, 2004 में लकवा का शिकार हुएद्ध फिर भी शाही अंदाज बरकरार रहा। अब देखना है कि चंद्र के बाद उनके बड़े बेटे हमीर सिंह विरासत को किस तरह संभलते हैं।
राणा चंद्र सिंह के निधन से पाकिस्तान का पूरा हिंदू समाज शोक ग्रस्त हुआ होगा। राजनीतिक बंधन मजबूरी हो सकती है। लेकिन, हिंदू बहुल जिलों अमरकोट, मीरपुर खास और मिट्ठी में कारोबार बंद रखे गए। इससे उनकी लोकप्रियता का अंदाजा हो जाता है। उन्होंने शानौ शौकत की जिंदगी जीने के बाद भी आम लोगों को अपने से जोड़े रखना जरूरी समझा।चंद्र सिंह का जन्म सिंध के अमरकोट के गांव राणा जागीर में 1930 में हुआ। वहीं शुरूआती पढ़ाई की।
इसके बाद भारत के देहरादून से स्नातक की डिग्री ली। 24 साल की उम्र में ही पाकिस्तान की राजनीति में आ गए। शायद राजनीति में आना उनकी मजबूरी थी। रसूख बनाए रखने के लिए राजनीति पाकिस्तान में भी रजवाड़ों के लिए जरूरी हो गई है।राणा चंद्र सिंह की शादी बीकानेर के राजा रावत तेज सिंह की पुत्री सुभद्रा कुमारी से हुई। सुभद्रा की बहन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री वी।पी. सिंह की पत्नी थीं। पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में राणा चंद्र सिंह का खासा रसूख रहा। वे लगातार आठ बार संसद के सदस्य बने। कई बार केंद्रीय मंत्री भी रहे।
सिंध की राजनीति में उनका खास स्थान और प्रभाव था। वे पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो करीबी मित्र थे। चंद्र सिंह का नाम उस समय चर्चा में आए जब वे उस तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का हिस्सा बने। 1990 के चुनाव में उन्होंने राष्ट्रीय एसेंबली की सीट से जीत हासिल की। नवाज शरीफ की सरकार का समर्थन किया। चंद्र सिंह ने कभी भारत और पाकिस्तान की कूटनीति में टांग नहीं अड़ाई। वे वहां रहे। अपना रसूख कायम करने की कोशिश करते रहे।
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