Saturday, February 5, 2011

उन्मादिनी सी कामिनी सी

कौन तुम उन्मादिनी सी कामिनी सी
आज मन मेरे समाती जा रही हो
आज ये अब बोली कहानी चल रही है
धड़कनों में गीत कोई गा रही हो,
प्रकृति का धवल है हर श्रंृगार
नूतनमन को यह भा रहा है
प्यार का सौहाद्र, हर स्वर अबोला
आज यह विभ्रान्त पर छा रहा है
प्रीत के ये शब्द सा ये जगत
विस्तृत प्रणय में ही अब सिमट कर रह गया है
हो रहा आभास पास आती जा रही
आज मने से ये बात कोई कह गया
चाहता तुम पर लिखूं मैं गीत गंगा बने
जो प्रणय की अब ऐसी कहानी चंचल
सरिताओं की मस्तियां छीनकर भरूं मैं
स्वयं उसमें ऐसी रवानी कौन जाने स्वप्न पूरा हो,
न होया टूट जाए तडि़त हीरक हार सा
वेदना की हृदय में ज्वाला धधकती रहे
बिखरा रहूं खंडित मैं किसी उपहार सा।
श्याम मोहन दुबे

Friday, February 4, 2011

प्यार हो जायेगा

प्यार हो जाएगा तुमको भी इजाजत के सिवा
चैन ना पाओगे दीदार की राहत के सिवा
तू अपनी चाहतों में इतनी कशिश पैदा कर
उसे कुछ और ना भाए तेरी चाहत के सिवा
फरेब खा के नहीं आया हूं मयखाने में
और भी जख्म हैं ऐ लोगों मोहब्बत के सिवा
दबाना हो किसी को तो दबाओ अहसान तले
तरीके और भी हैं दुनिया में ताकत के सिवा
उसकी कुछ यादें कुछ अहसास और कुछ सपने
और हम कुछ भी नहीं रखते जरूरत के सिवा
इश्क की आंच रूह तलक आ पहुंची जिस्म में
कुछ भी नहीं रहता हरारत के सिवा
शहरेयार काश दिल भी होता इन हसीनों में
मोहब्बत करनी भी आ जाती नजाकत के सिवा।
शहरेयार

Saturday, January 8, 2011

तेरी आंखों

तेरी आंखों से दूर होकर भी
ऐसा लगता है, उनमें डूबा हूं
अपना अब तक मिलन तो हो न सका,
ये तो पिछले जनम का रिश्ता है,
तुमको देखे बिना न चैन मुझे,
तुमको देखूं भी तो करार नहीं,
मेरी चाहत तुम्हीं हो, पूजा हो,
कौन कहता है, तुमसे प्यार नहीं
कुंवर सलीम खान

Friday, January 7, 2011

उजड़ी बस्ती

जब कभी तकसीम कहीं उजाले हुए हैंअंधेरों के हिस्से,
कुछ निवाले हुए हैंनिशां उजड़ी बस्ती के,
आज भी हैं कायम रौनाके वो शहर की सम्हाले हुए हैं।
फुटपाथ हमारी जिंदगी के निशां हुए जाते हैं
देखकर परेशानियां, क्यूं परेशां हुए जाते हैंवे कहते हैं
क्या करते रहे, इतने बरस यहांतेरे सामने के लोग,
कहकशां हुए जाते हैं।

अमर मलंग, कटनी

Monday, December 20, 2010

दिन में नहीं दिखतीं


दिन में नहीं दिखतीं,
रात में आराम का वक्त होता है तब दिखती हैं
बिस्तर में चींटियां रेंगती हैं,
कुरेदती हैं, उधेड़ती हैं
जिंदगी के सफरनामे में,
किए गए वादों को,
यादों को फटकार कर फिर से बिछाते हैं
चादर फिर भी नहीं मिटतीं सिलवटें
वक्त की जिन पर कभी सहेजी थी मानवता को
दुलारा था विवशताओं को,
ठहाके लगाए थे अहंकार ने अपनी हार पर,
कतार वह चलने लगी हैं फिर से चींटियां चादर पर
फिर से पैदा कर सकती हैं सिलवटेंरातों में,
एक साथ जागने की मजबूरी पैदा कर सकती हैं चींटियां
फिर, फैसलों में और वक्त क्योंउधड़ी हुई तार-तार जिंदगी
को सिल नहीं सकतीं ये चींटियांबस,
मजबूरी के साथ-साथ चलती दीखती हैं ये चीटियां।
गोविंद खरे

Monday, December 13, 2010

निगहबां बदल दीजिए

फिर वही शहर है आशियां बदल दीजिये
फिर वही बशर है निगहबां बदल दीजिए
कर दिया महंगाई ने जीने का मजा किरकिरा
फिर वही नजर है मेहरबां बदल दीजिए
खाई थीं मां के हाथों जो चाहत भरी रोटियां
फिर वही असर है, जुबां बदल दीजिए
रोशनी में रोशन था पहले भी ये चमन
फिर वही सहर है बागवां बदल दीजिए
ख्वाबों की ताबीर कभी हकीकत संवार देगी
फिर वही सफर है कारवां बदल दीजिए
रहा नहीं यकीं अब बातों का उनकी
फिर वही लहर है, दास्तां बदल

अमर मलंग

Monday, November 1, 2010

समाजवाद

उत्तर प्रदेश इस समय संभवत: पूरे देश से कई मायनों में अलग हो गया है। यहां की राजनीति देश की राजनीति से अलग हो गई है। यहां गरीबी की बाढ़ है। बेरोजगारी का चरम है। अपराध का सागर हिलोरें मार रहा है। बलात्कार ऐसे हो रहे हैं, जैसे हर कहीं सुहागरात मनाई जा रही है। अच्छी बात एक ही दिखती है कि दलितों की मसीहा मायावती कह तूती बोल रही है। वे मदमस्त हाथी की तरह चलती हैं। मुलायम जैसे कुत्ते भौंकते रहते हैं। माया की आड़ में पुलिस वाले किसी की भी बहन-बेटी के साथ सुहागरात मना लेते हैं। एक अच्छी बात और हो रही है। यूपी में समाजवाद आ गया है। वहां अब किसी जाति या धर्म विशेष का महत्व सिर्फ दलितों के आगे-पीछे घूमता है। ब्राह्मण मायावती के पैर ऐसे छूता है, जैसे कभी दलित पंडित जी के पैर छूता था। ठाकुर साहबों की हालत ऐसी हो गई है कि कुछ समझ नहीं पा रहे हैं। राजनाथ का पता नहीं। राजा भैया कुंडा के कुंड में लगता है छुपे बैठे हैं। अमर सिंह को मुलायम ने ऐसी औकात दिखाई कि राजनीति के पर्दे से गायब हो गए। मायावती के कारिंदों को यह मतलब नहीं होता कि बंदा किस जाति, धर्म का है। उन्हें सिर्फ वसूली से मतलब रह गया है। इसे भी तो 'समाजवादÓ ही कहेंगे न?