Sunday, November 1, 2009

दुष्यंत की याद में

संचार मंत्रालय ने गीतकार दुष्यंत कुमार पर डाक टिकट जारी किया है। यह सुनना मीठा लग सकता है। लेकिन, कड़वी बात यह रही कि मंत्रालय ने इसे बेहद गोपनीय रखा। फिर भी सुखदायक है कि दुष्यंत जैसे लोग भी सरकारी महकमे को याद आ जाते हैं। नहीं तो किसी को फुरसत कहां है। भ्रष्टाचार के ज्वालामुखी पर खड़ा देश कहां जाएगा, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है। लेकिन, यह तय है कि दुष्यंत जैसों की यादें रोमांचित करती रहेंगी। कुछ करने का जज्बा देती रहेंगी। शायद अच्छा बनने की राह भी दिखाती रहेंगी। संभव है सरकारी महकमा भी कुछ सुधर जाए। नहीं भी सुधरेगा तो क्या हुआ। देश तो चलता रहा है। आगे भी चलता रहेगा।

दुष्यंत की पंक्तियां जवानी में ज्यादा अच्छी लगती हैं। जवानी सपनों की दुनिया में रहती है। इसीलिए सबकुछ रूमानी लगता है। दुष्यंत कुमार स्कूल या साहित्यिक मत के हिमायती नहीं थे। वे एक ऎसी कविता शैली की तलाश कर रहे थे जो स्वाभाविक हो। काव्य के प्रति उनके इसी दृष्टिकोण ने उनमें सामान्य जीवन के यथार्थ के प्रति विश्वास पैदा किया। 70 के दशक के में दुष्यंत ने गजल को नई जिंदगी दी। दिल को छूने वाली सामाजिक सच्चाइयों को सामने रखा। उनकी शैली ने लोगों पर जादू किया। वे खूब पढ़े गए। पढ़े जा रहे हैं। आगे भी उनके दीवाने कम नहीं होंगे। उनका संग्रह साये में धूप ने तो धमाल ही कर दिया। उनका दर्द हर शब्दों में बयां होता था।॥यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहां से चलें और उम्रभर के लिए। वे क्रांतिकारी भी थे। संवेदनशील भी। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।


उनकी ये पंक्तियां भी रोमांचित जरूर करती हैं


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।दोस्तों, अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नैपथ्य में संभावना है। यह पहाड़ी पांव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है, कल दरीचे ही बनेंगे द्वार, अब तो पथ यही है।एक चिनगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों, इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कंमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा, मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं, कोई हंगामा करो ऎसे गुजर होगी नहीं। यह लड़ाई, जो कि अपने आपसे मैंने लड़ी है, यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है।कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए, कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नहीं, पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बद्दुआ।

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