ham khud ko samajh rahe hain. shayad isme samay jyada lagaga. ho sakta hai ki samajh na bhi paoon. fir bhi koshish karta rahoonga. karibion ka sath bhi leta rahoonga.
Thursday, April 14, 2011
मेहरानगढ़
Thursday, March 31, 2011
शिल्पा की सेक्स अपील

Friday, March 25, 2011
बेरंग हुआ गुलाल

सरकारी होली खेल के मंत्री हो रहे लालम लाल
जनता लेके खड़ी कटोरा अफसर भैया मालामाल
पानी की अब कमी बहुत है कैसे खेलूं रंग गुलाल
आंखों का पानी भर गया हो गया ऐसा हाल बेहाल
आतंकी खेले खून की होली दिन महीने पूरा साल
कैसा ये जेहाद है भैया मासूमों को करे हलाल
खून से रंगे हाथ हैं इनके दिल में इनके नहीं मलाल
दहेज की होली खेले ससुरा
बहू बन गई जी का काल
सासू भी है बड़ी सयानी उसने जीना किया मुहाल
पत्नी रोए खून के आंसू पति हस रहा दे के ताल
सात जन्म का बंधन मारो सात दिनों में हुआ बेहाल
प्यार का रंग फीका पड़ गया प्यारा लगे मुफ्त का माल
काले रंग से देश रंग गया चेहरे को क्या करना लाल
काला धन या दाल में काला काली हो गई सारी दाल
होली की क्या बात करू मैं संसद में कीचड़ रहे उछाल
चहरे के रंगत उड़ी हुई है कही पे सूखा कही अकाल
रंग भेद से लड़ता गांधी रंगों में भी है जंजाल
प्रेम का रंग सबसे पक्का लगे सो वो होए निहाल।
आलोक तिवारी, कटनी
Sunday, February 6, 2011
Saturday, February 5, 2011
उन्मादिनी सी कामिनी सी

आज मन मेरे समाती जा रही हो
आज ये अब बोली कहानी चल रही है
धड़कनों में गीत कोई गा रही हो,
प्रकृति का धवल है हर श्रंृगार
नूतनमन को यह भा रहा है
प्यार का सौहाद्र, हर स्वर अबोला
आज यह विभ्रान्त पर छा रहा है
प्रीत के ये शब्द सा ये जगत
विस्तृत प्रणय में ही अब सिमट कर रह गया है
हो रहा आभास पास आती जा रही
आज मने से ये बात कोई कह गया
चाहता तुम पर लिखूं मैं गीत गंगा बने
जो प्रणय की अब ऐसी कहानी चंचल
सरिताओं की मस्तियां छीनकर भरूं मैं
स्वयं उसमें ऐसी रवानी कौन जाने स्वप्न पूरा हो,
न होया टूट जाए तडि़त हीरक हार सा
वेदना की हृदय में ज्वाला धधकती रहे
बिखरा रहूं खंडित मैं किसी उपहार सा।
श्याम मोहन दुबे
Friday, February 4, 2011
प्यार हो जायेगा

चैन ना पाओगे दीदार की राहत के सिवा
तू अपनी चाहतों में इतनी कशिश पैदा कर
उसे कुछ और ना भाए तेरी चाहत के सिवा
फरेब खा के नहीं आया हूं मयखाने में
और भी जख्म हैं ऐ लोगों मोहब्बत के सिवा
दबाना हो किसी को तो दबाओ अहसान तले
तरीके और भी हैं दुनिया में ताकत के सिवा
उसकी कुछ यादें कुछ अहसास और कुछ सपने
और हम कुछ भी नहीं रखते जरूरत के सिवा
इश्क की आंच रूह तलक आ पहुंची जिस्म में
कुछ भी नहीं रहता हरारत के सिवा
शहरेयार काश दिल भी होता इन हसीनों में
मोहब्बत करनी भी आ जाती नजाकत के सिवा।
शहरेयार
Saturday, January 8, 2011
तेरी आंखों
Friday, January 7, 2011
उजड़ी बस्ती

कुछ निवाले हुए हैंनिशां उजड़ी बस्ती के,
आज भी हैं कायम रौनाके वो शहर की सम्हाले हुए हैं।
फुटपाथ हमारी जिंदगी के निशां हुए जाते हैं
देखकर परेशानियां, क्यूं परेशां हुए जाते हैंवे कहते हैं
क्या करते रहे, इतने बरस यहांतेरे सामने के लोग,
कहकशां हुए जाते हैं।
अमर मलंग, कटनी
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